
करीब बीस साल पहले भारत ने पहली बार ईरान के परमाणु कार्यक्रम के खिलाफ मतदान किया था। तब से लेकर अब तक भारत लगातार कूटनीतिक संतुलन बनाए रखने की कोशिश कर रहा है — एक तरफ अमेरिका और इज़राइल, दूसरी तरफ ईरान जैसे पड़ोसी देश के साथ उसके ऐतिहासिक संबंध।
24 सितंबर 2005 को, भारत ने अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के उस प्रस्ताव (GOV/2005/77) के पक्ष में मतदान किया था, जिसमें ईरान को अपने परमाणु सुरक्षा दायित्वों का उल्लंघन करने वाला पाया गया था। उस समय भारत अमेरिका के साथ अपने नागरिक परमाणु समझौते को लेकर बातचीत कर रहा था, और वाशिंगटन के दबाव में आकर ईरान के खिलाफ गया।
2024 में, जब फिर से ईरान का मामला सामने आया, तो भारत ने इस बार मतदान से परहेज़ (abstain) किया — न समर्थन किया, न विरोध। यह दर्शाता है कि भारत अब भी इस मुद्दे पर चिंतित है, लेकिन कूटनीतिक रूप से संतुलन साध रहा है।
ईरान और भारत के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक संबंध हैं, लेकिन एक परमाणु सम्पन्न ईरान को लेकर भारत की चिंता साफ है — खासतौर पर जब भारत पश्चिम एशिया में अपने हितों को संतुलित रखने की रणनीति पर चल रहा है।